श्रवण दोष (Hearing Impairment)
प्रस्तावना
मानव संप्रेषण, भाषा विकास और सामाजिक सहभागिता में श्रवण शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका
होती है। श्रवण दोष से आशय आंशिक या पूर्ण रूप से सुनने में असमर्थता से है,
जो एक कान (एकपक्षीय) अथवा दोनों कानों (द्विपक्षीय) में हो सकती
है। यह जन्मजात (Congenital) अथवा अर्जित (Acquired) हो सकती है और इसकी तीव्रता हल्की से गहन तक हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य
संगठन (WHO, 2021) के अनुसार, विश्व की
लगभग 5% जनसंख्या अर्थात 43 करोड़ लोग
गंभीर श्रवण हानि से पीड़ित हैं और 2050 तक यह संख्या 70
करोड़ तक पहुँचने की संभावना है। श्रवण दोष न केवल भाषा और भाषण
विकास को प्रभावित करती है, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सामाजिक-भावनात्मक जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालती है।
श्रवण दोष के प्रकार और स्तर
श्रवण दोष को मुख्यतः स्थान (Location) और गंभीरता (Severity)
के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- प्रकार (Types of
Hearing Loss):
- कंडक्टिव हियरिंग लॉस (Conductive Hearing Loss): बाहरी या मध्यकर्ण की समस्या के कारण
(जैसे कान में मैल, संक्रमण, हड्डी
की असामान्यता), जिसे दवा या शल्य चिकित्सा द्वारा ठीक
किया जा सकता है।
- सेंसरिन्यूरल हियरिंग लॉस (Sensorineural Hearing Loss): भीतरी कान (Cochlea) अथवा श्रवण तंत्रिका को क्षति; प्रायः स्थायी
होती है और हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट से प्रबंधित की जाती है।
- मिक्स्ड हियरिंग लॉस (Mixed Hearing Loss): कंडक्टिव और सेंसरिन्यूरल हानि का
मिश्रण।
- श्रवण हानि के स्तर (ASHA, 2020):
- हल्की (26–40 dB हानि): धीमी
आवाज़ सुनने में कठिनाई।
- मध्यम (41–55 dB हानि): बातचीत
स्पष्ट सुनने के लिए ऊँची आवाज़ की आवश्यकता।
- गंभीर (71–90 dB हानि): बिना
यंत्र के बोलचाल को समझना कठिन।
- गहन (91+ dB हानि): सामान्यतः
बोलचाल की ध्वनियाँ नहीं सुन पाते।
श्रवण दोष के कारण
श्रवण हानि के कारण विविध हैं और आनुवंशिक, चिकित्सीय अथवा पर्यावरणीय हो सकते हैं।
- जन्मजात कारण – आनुवंशिक विकार, जन्म संबंधी जटिलताएँ, कम वजन, मातृ संक्रमण (जैसे रुबेला)।
- अर्जित कारण – कान का संक्रमण, शोर-प्रदूषण, हानिकारक औषधियाँ, सिर की चोट, बुढ़ापा (Presbycusis)।
- सामाजिक-पर्यावरणीय कारण – उचित चिकित्सा की कमी, बाल्यावस्था में संक्रमण की उपेक्षा।
श्रवण दोष का प्रभाव
श्रवण दोष का प्रभाव बहुआयामी होता है:
- भाषा और संप्रेषण विकास – हस्तक्षेप के अभाव में बच्चों की
भाषा और भाषण में विलंब होता है, जिससे साक्षरता और
शैक्षणिक उपलब्धि प्रभावित होती है (Yoshinaga-Itano, 2003)।
- शैक्षणिक चुनौतियाँ – पारंपरिक कक्षा में ध्वनिकी की समस्या, शिक्षक
प्रशिक्षण की कमी और सहायक उपकरणों का अभाव।
- सामाजिक-भावनात्मक विकास – अकेलापन, आत्मसम्मान
की कमी और सामाजिक अलगाव (Mitchell & Karchmer, 2006)।
- रोजगार अवसर – निजी व सरकारी क्षेत्रों में संचार दोष, भेदभाव
और सीमित अवसर (Punch, Hyde, & Power, 2007)।
प्रबंधन और हस्तक्षेप
श्रवण दोष के प्रबंधन हेतु बहुआयामी उपाय किए जाते हैं:
- चिकित्सीय एवं शल्य चिकित्सा उपचार – संक्रमण का इलाज, अवरोध हटाना, कान की सर्जरी।
- श्रवण यंत्र और कॉक्लियर इम्प्लांट – ध्वनियों को स्पष्ट कर सुनने में
सहायता।
- सहायक उपकरण (Assistive
Devices) – एफ.एम. सिस्टम, साउंड फील्ड एम्प्लीफिकेशन, कैप्शनिंग।
- भाषण और भाषा चिकित्सा – उच्चारण, शब्दावली
एवं संप्रेषण क्षमता का विकास।
- शैक्षणिक सहयोग – समावेशी शिक्षा, संसाधन कक्ष, दृश्य सहायक सामग्री एवं सांकेतिक भाषा का प्रयोग।
- परिवार एवं समुदाय की भागीदारी – अभिभावक परामर्श और प्रशिक्षण।
- नीतिगत एवं कानूनी प्रावधान – भारत में दिव्यांगजन अधिकार
अधिनियम, 2016 तथा अमेरिका में IDEA,
2004 जैसे कानून समान अवसर सुनिश्चित करते हैं।
चुनौतियाँ
- नवजात श्रवण जांच की कमी।
- श्रवण यंत्रों और इम्प्लांट की अधिक लागत।
- प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी।
- सामाजिक कलंक और भ्रांतियाँ।
- समावेशी शिक्षा नीतियों का आंशिक क्रियान्वयन।
निष्कर्ष
श्रवण दोष एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य एवं सामाजिक समस्या
है। इसका प्रभाव व्यक्ति के भाषा विकास, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन पर पड़ता है। शीघ्र
पहचान, समय पर हस्तक्षेप, आधुनिक
उपकरणों का उपयोग, पारिवारिक सहयोग और समावेशी शिक्षा
नीतियाँ इसके प्रभाव को कम करने में सहायक हैं। यदि चिकित्सा, शिक्षा और नीतिगत स्तर पर प्रभावी कदम उठाए जाएँ तो श्रवण दोष व्यक्ति भी
सम्मानजनक और सशक्त जीवन जी सकते हैं।
संदर्भ सूची
- American
Speech-Language-Hearing Association. (2020). Degree of hearing loss.
Retrieved from https://www.asha.org/public/hearing/Degree-of-Hearing-Loss/
- Mitchell,
R. E., & Karchmer, M. A. (2006). Demographics of deaf education: More
students in more places. American Annals of the Deaf, 151(1),
95–104.
- Punch, R.,
Hyde, M., & Power, D. (2007). Career and workplace experiences of
Australian university graduates who are deaf or hard of hearing. Journal
of Deaf Studies and Deaf Education, 12(4), 504–517.
- World
Health Organization. (2021). World report on hearing. Geneva: World
Health Organization.
- Yoshinaga-Itano,
C. (2003). From screening to early identification and intervention:
Discovering predictors to successful outcomes for children with
significant hearing loss. Journal of Deaf Studies and Deaf Education, 8(1),
11–30.












