सूनने की प्रक्रिया
हमारे कान के कार्य उस समय प्रारम्भ होते है, जब किसी आवाज को सूनने या सम्प्रेषण करने होते हैं I
बाह्य कर्ण :-
सबसे पहले हमारा बाह्य कान वातावरण में उपस्थित विभिन्न प्रकार की आवाजों को इकठ्ठा करता है I
- वातावरण में उपस्थित आवाजों को इकट्ठा करता है जो एक उर्जा होती है उसे ध्वनि उर्जा कहलाती है
- बाह्य कान अर्थात पिन्ना का कार्य उन आवाजों को लगभग 5000 से 6000 हर्ट्ज तक बढ़ाना है और उसके बाद आगे की तरफ प्रेषित करता हैI
- ये आवाजे कर्ण नलिका में प्रवेशित हो जाती है और कर्ण नलिका उन आवाजो (5000 से 6000 हर्ट्ज) को 2500 से 3000 हर्ट्ज तक करके कान के परदे तक भेजता है I
- ये आवाजें जाकर जब कान के पर्दे से टकराती है तो उसमे हलचल उत्पन्न हो जाती है I
मध्य कर्ण :-
- कान के पर्दे में आवाजो के टकराने से (5) मध्य कर्ण की तीनों हड्डियों (मैलिअस, इन्कस एवं सतैपिस ) में भी हलचल उत्पन्न होती है अर्थात ध्वनि उर्जा यहाँ पर आकर यांत्रिक उर्जा का रूप धारण कर लेती है I
- यह यांत्रिक उर्जा आतंरिक कान तक प्रसार करने लगाती है I
अन्तः कर्ण या आतंरिक कान :-
- मध्य कर्ण में ध्वनि यांत्रिक उर्जा में बदल जाती है जिसके कारण अन्तः कर्ण में भी हलचल होने लगती है
- अन्तः कर्ण को दो भाग होता है जहाँ पहला काक्लिया और वेस्तिबुल होता है
- जहाँ पर काक्लियर डक्ट , सकेला वेस्टिबुली ,सकेला टिम्पैनी पायी जाती है जिसमे इंडोलिम्फ और पेरीलिम्फ द्रव पाया जाता है जिसमे यांत्रिक उर्जा रासायनिक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है I
ऑर्गन ऑफ़ कार्टी :-
आतंरिक कर्ण में ही ऑर्गन ऑफ़ कार्टी पाया जाता है I यह बेसलर झिल्ली पर पाया जाता है ,बेसलर झिल्ली सकेला मिडिया और सकेला टिम्पैनी को अलग करने वाली झिल्ली होती है इसमें लगभग 17000 रोम कोशिकाएं जाती है बाह्य रोम कोशिकाएं एवं आतंरिक रोम कोशिकाएं I
यहा तक आते आते ध्वनि का जो बदलता प्रारूप जो रासायनिक था वह बाह्य रोम कोशिकाएं एवं आतंरिक रोम
कोशिकाओं के आपस में टेक्टोरियल मेम्ब्रेन या झिल्ली से आपस में घर्षण के कारण विधुत उर्जा में परिवर्तित हो जाती है I यह विधुत उर्जा श्रवण मार्ग के द्वारा हमारे मष्तिष्क तक ध्वनि संकेत को पहुचती है
इस प्रकार से व्यक्ति किसी भी ध्वनि को सून पाने में सहायता मिलाती है I












