Thursday, April 12, 2018

सूनने की प्रक्रिया



सूनने की प्रक्रिया 

          हमारे कान के कार्य उस समय प्रारम्भ होते है, जब किसी आवाज को सूनने या सम्प्रेषण करने होते हैं I 
बाह्य कर्ण :-
              सबसे पहले हमारा बाह्य कान वातावरण में उपस्थित विभिन्न प्रकार की आवाजों को इकठ्ठा करता है I
  1. वातावरण में उपस्थित आवाजों  को इकट्ठा करता है जो एक उर्जा होती है उसे ध्वनि उर्जा कहलाती है 
  2. बाह्य कान अर्थात पिन्ना  का कार्य उन आवाजों को लगभग 5000 से 6000 हर्ट्ज तक बढ़ाना है और उसके बाद आगे की तरफ प्रेषित करता हैI 
  3. ये आवाजे कर्ण नलिका में प्रवेशित हो जाती है और कर्ण नलिका उन आवाजो (5000 से 6000 हर्ट्ज) को 2500 से 3000 हर्ट्ज तक  करके कान के परदे तक भेजता है I 
  4. ये आवाजें जाकर जब कान के पर्दे से टकराती है तो उसमे हलचल उत्पन्न हो जाती है I 
मध्य कर्ण :-
  1. कान के पर्दे में आवाजो के टकराने से (5) मध्य कर्ण की तीनों हड्डियों (मैलिअस, इन्कस एवं सतैपिस ) में भी हलचल उत्पन्न होती है अर्थात ध्वनि उर्जा यहाँ पर आकर यांत्रिक उर्जा का रूप धारण कर लेती है I 
  2. यह यांत्रिक उर्जा आतंरिक कान तक प्रसार करने लगाती है I 
अन्तः कर्ण या आतंरिक कान :-
  1. मध्य कर्ण में ध्वनि यांत्रिक उर्जा में बदल जाती है जिसके कारण अन्तः कर्ण में भी हलचल होने लगती है 
  2. अन्तः कर्ण को दो भाग होता है जहाँ पहला काक्लिया और वेस्तिबुल होता है 
  3. जहाँ पर काक्लियर डक्ट , सकेला वेस्टिबुली ,सकेला टिम्पैनी पायी जाती है जिसमे  इंडोलिम्फ और पेरीलिम्फ द्रव पाया जाता है जिसमे यांत्रिक उर्जा रासायनिक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है I
ऑर्गन ऑफ़ कार्टी :-


  आतंरिक कर्ण में ही ऑर्गन ऑफ़ कार्टी पाया जाता है I यह बेसलर झिल्ली पर पाया जाता है ,बेसलर झिल्ली सकेला मिडिया और सकेला टिम्पैनी को अलग करने वाली झिल्ली होती  है इसमें लगभग 17000 रोम कोशिकाएं जाती है बाह्य रोम कोशिकाएं एवं आतंरिक रोम कोशिकाएं I


यहा तक आते आते  ध्वनि का जो बदलता प्रारूप जो रासायनिक था वह बाह्य रोम कोशिकाएं एवं आतंरिक रोम 
कोशिकाओं के आपस में टेक्टोरियल मेम्ब्रेन या झिल्ली से आपस में घर्षण के कारण विधुत उर्जा में परिवर्तित हो जाती है I यह विधुत उर्जा श्रवण मार्ग के द्वारा हमारे मष्तिष्क तक ध्वनि संकेत को पहुचती है 

इस प्रकार से व्यक्ति किसी भी ध्वनि को सून पाने में सहायता मिलाती है I    

Monday, April 9, 2018

कान की संरचना

मानव कान 

         जैसा की  हम  जानते हैं  मनुष्य के कान को आवाज की दुनिया  का द्वार कहा जाता है I यह व्यक्ति का एक ऐसा श्रवण का साधन है जो वातवराण  में उपस्थित ध्वनियो को हमारे मष्तिष्क तक ले जाने मे मदद करता  है  जिससे हमे ज्ञात होता है कि ध्वनि कहा से आ रही है?  ध्वनि किस प्रकार की है? ध्वनि किसकी है ? ध्वनि के श्रवण का स्तर क्या है? इन सभी प्रश्नो के उत्तर हमारे कान के कारण आसानी से मिल जाते हैं I 

मानव कान की संरचना :-
                                         मनुष्य का कान मुख्यतः तीन भागों में बटा  होता है 
  1. वाह्य कान (External Ear)
  2. मध्य कान (Middle Ear)
  3. आतंरिक  कान (Inner Ear) 
  1. वाह्य कान (External Ear):- इसका आकार कोन की आक्रती का होता है , इसके गहरे भाग को कोंचा कहते हैं बाहरी कान Elastic Cartilage का बना होता है इसमे खून का प्रवाह होता रहता है I इसमे एक वाह्य कर्ण नलिका होती है जिसका आकार 'S' की तरह होता है I इसके एक किनारे पर पिन्ना और दुसरे किनारे पर कान का पर्दा  होता है इसकी लम्बाई लगभग 25-40 मिमी० और Volume 4 CC का होता है I इसका बाहरी 2/3 भाग कार्टिलेज का बना होता है , अन्दर का १/3 भाग बोनी होती है कान की नली में भी खून का प्रवाह होता रहता है I 
    Outer Ear
  2. मध्य कान (Middle Ear):- यह कर्ण पटह से भीतरी शिरा की ओर करोटी की टिम्पैनिक बुल्ला (Tympanic Bulla ) में बंद हवा से भरी असममित गुहा के रूप में होती है I जिसे कर्ण गुहा (Tympanic Cavity) कहते हैं I इसके चारो-ओर की हड्डीयों पर श्लेमिका मढ़ी होती है , गुहा की चौड़ी यूस्टेचियन नलिका (Eustachian Tube ) द्वारा नाशाग्रसनी (Nasopharynx) में खुलती है I 
  • सबसे पहले हमारे कान में कान का पर्दा (Tympanic Membrane) होती है , यह बाहरी कान को मध्य कान से अलग करती है यह एक बहुत पतली झिल्ली की तरह होती है जिसकी मोटाई 1 / 10 मिमी ० होती है I इसका आकार अंडाकार होता है I कान के परदे से परस्पर जुड़ी तीन छोटी-छोटी हड्डियाँ होती हैं बाहर की ओर मैलिअस (Malleus)  बीच में इनकस (Incus) तथा इस्टेपिस  (Stapes) होती है I 
  • सभी कर्ण अस्थिकाएं लचीले स्नायुओं  (Ligaments )द्वारा कर्ण गुहा की दिवार से गुहा में धसी रहती है I 
  • इसके अतिरिक्त मैलिअस (Malleus) , Tensor Tympani नामक दृढ पेशी द्वारा जुड़ी होती है I इस पेशी के खिंचाव से टिम्पैनिक कला बनी रहती है 
  • मैलिअस (Malleus ) जबड़ों की आर्टिकुलर हड्डियों से जुड़ी रहती है I 
  • इन्कस (Incus) क्वाट्रैड हड्डियों तथा स्टैपीस (Stapes ) फेनेस्ट्रा ओवैलिस पर मढ़ी झिल्ली से लगी रहती है I
  • Middle Ear
3.आतंरिक  कान (Inner Ear) :-अन्तः कर्ण दो भागों में बटा होता है 
  1. काक्लिया (Cochlea- Organ of hearing) 
  2. वेस्टीबुली (Vestibule- Organ of balance)
  1. काक्लिया (Cochlea- Organ of hearing) :- यह घोघे की आकार का बोनी होती है यह मध्य कान की तरफ़ होता  है यह 2/3 भाग मुडा होता है 
    Cochlea-Organ of hearing
    इसका आकार चौड़ा और मध्य कर्ण की तरफ होता है एपेक्स पतला  या नुकीला होता है I इसमे दो प्रकार की खिड़की होती है एक ओवल विंडो और राउंड विंडो इन दोनों खिडकियों को आधार या वेशलर मेम्ब्रेन अलग करती है काक्लिया का कम्पार्टमेंट जो ओवल विंडो से जुड़ता है वह वेस्टीबुली होता है , इसका वह कम्पार्टमेंट जो राउंड विंडो से जुडा रहता है उसे सकेला टिम्पैनी कहते है , इन दोनों के बिच में स्कैला मिडिया जिसमे इंडोलिम्फ भरा होता है इस भाग में ऑर्गन आफ कार्टी रहता है जिसे श्रवण का अंत कहते हैं I 
  2. वेस्टीबुली (Vestibule- Organ of balance):- इसके द्वारा व्यक्ति का बैलेंस बनता है अनु स्थिति का पता चलता है I 
इस प्रकार व्यक्ति का श्रवण सही तरह से होता है I