Thursday, March 14, 2019

श्रवण हस्तक्षेप (Aural Intervention)

श्रवण हस्तक्षेप (Aural Intervention)

परिचय

श्रवण हस्तक्षेप (Aural Intervention) से आशय उन संगठित प्रयासों से है जो श्रवण बाधित व्यक्तियों की श्रवण क्षमता, भाषण एवं भाषा विकास को सुधारने के लिए किए जाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य अवशिष्ट श्रवण शक्ति का अधिकतम उपयोग कराना है, जिसके लिए श्रवण यंत्र (Hearing Aids) और कॉक्लियर इम्प्लांट जैसे उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। साथ ही, व्यवस्थित श्रवण प्रशिक्षण एवं भाषण-भाषा चिकित्सा द्वारा बच्चों को सुनने, बोलने और समझने की क्षमता विकसित करने में सहायता दी जाती है। हाल के वर्षों में प्रारंभिक पहचान एवं शीघ्र हस्तक्षेप कार्यक्रमों ने श्रवण बाधित बच्चों के जीवन की दिशा बदल दी है। इस प्रकार, श्रवण हस्तक्षेप केवल चिकित्सीय प्रक्रिया न होकर एक विकासात्मक दृष्टिकोण है, जो संप्रेषण, सामाजिक सहभागिता और शैक्षणिक उपलब्धि को प्रोत्साहित करता है।

श्रवण हस्तक्षेप का महत्व

श्रवण हस्तक्षेप का महत्व इस तथ्य में निहित है कि श्रवण शक्ति बोलचाल की भाषा, साक्षरता और संज्ञानात्मक कौशल के विकास की नींव है। शोध यह सिद्ध करता है कि बिना हस्तक्षेप वाले श्रवण बाधित बच्चों में भाषा अर्जन, भाषण विकास और सामाजिक-भावनात्मक प्रगति में गंभीर विलंब होता है। परिणामस्वरूप, उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। श्रवण हस्तक्षेप निम्नलिखित रूप से लाभकारी होता है–

  1. संचार कौशल का विकास – बच्चों को बोली जाने वाली भाषा समझने और प्रयोग करने में सक्षम बनाता है।

  2. समावेशन में सहयोग – श्रवण बाधित बच्चों को सामान्य साथियों के साथ पढ़ने-लिखने का अवसर देता है।

  3. स्वतंत्रता को प्रोत्साहन – बच्चों को आत्मविश्वास के साथ दैनिक जीवन जीने योग्य बनाता है।

  4. सामाजिक अलगाव की रोकथाम – सामाजिक सहभागिता एवं भावनात्मक संतुलन को बढ़ावा देता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन के आरंभिक वर्षों में मस्तिष्क की श्रवण तंत्रिकाओं का तीव्र विकास होता है, इसलिए शीघ्र हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है। दो वर्ष की आयु से पूर्व हस्तक्षेप प्राप्त करने वाले बच्चों में भाषण और भाषा विकास उल्लेखनीय रूप से बेहतर पाया गया है।

श्रवण हस्तक्षेप के दृष्टिकोण

श्रवण हस्तक्षेप विभिन्न दृष्टिकोणों पर आधारित होता है, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. श्रवण-मौखिक दृष्टिकोण (Auditory-Verbal Approach) – इसमें अवशिष्ट श्रवण का अधिकतम उपयोग कर बच्चों को केवल सुनकर बोलना सिखाया जाता है। इसमें दृश्य संकेतों जैसे होठों की पढ़ाई को कम महत्व दिया जाता है।

  2. श्रवण-ओरल दृष्टिकोण (Auditory-Oral Approach) – इसमें श्रवण प्रशिक्षण के साथ-साथ दृश्य संकेत जैसे होठों की पढ़ाई को भी अनुमति दी जाती है।

  3. टोटल कम्युनिकेशन (Total Communication) – इसमें भाषण, होठों की पढ़ाई, सांकेतिक भाषा और अन्य दृश्य साधनों का संयोजन किया जाता है।

  4. द्विभाषी-द्विसांस्कृतिक दृष्टिकोण (Bilingual-Bicultural Approach) – इसमें सांकेतिक भाषा को पहली भाषा और बोली/लिखित भाषा को दूसरी भाषा के रूप में सिखाया जाता है।

हर दृष्टिकोण का चयन बच्चे की श्रवण हानि की तीव्रता, पहचान की आयु, पारिवारिक प्राथमिकताओं और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर किया जाता है।

तकनीकें और रणनीतियाँ

श्रवण हस्तक्षेप में विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जैसे:

  1. श्रवण प्रशिक्षण – ध्वनियों को पहचानने, भेद करने, नाम देने और अर्थ समझने की क्षमता विकसित करना।

  2. भाषण चिकित्सा – ध्वनियों के सही उच्चारण, स्वर नियंत्रण और वाक् स्पष्टता पर काम करना।

  3. भाषा प्रोत्साहन – बच्चे की बातों को दोहराना, विस्तार करना और शब्दावली को बढ़ाना।

  4. सहायक तकनीक का प्रयोग – श्रवण यंत्र, कॉक्लियर इम्प्लांट, एफ.एम. सिस्टम आदि का उपयोग।

  5. माता-पिता एवं परिवार की भागीदारी – अभिभावकों को प्रशिक्षण देकर प्राकृतिक वातावरण में भाषा-समृद्ध अवसर उपलब्ध कराना।

  6. कक्षा सहयोग – कक्षा ध्वनिकी में सुधार, बैठने की उचित व्यवस्था और शिक्षण तकनीकों में परिवर्तन।

चुनौतियाँ

श्रवण हस्तक्षेप को सफल बनाने में कई चुनौतियाँ सामने आती हैं, जैसे:

  • नवजात श्रवण जांच की सार्वभौमिकता न होने के कारण देर से पहचान।

  • प्रशिक्षित विशेषज्ञों एवं आधुनिक उपकरणों की सीमित उपलब्धता।

  • आर्थिक बाधाएँ, क्योंकि उपकरण एवं उपचार महँगे होते हैं।

  • अभिभावकों की जागरूकता की कमी।

  • बहुभाषिक वातावरण में भाषा चयन की समस्या।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, श्रवण हस्तक्षेप श्रवण बाधित व्यक्तियों के पुनर्वास और पुनर्विकास की आधारशिला है। यह न केवल श्रवण और भाषण विकास को संभव बनाता है, बल्कि सामाजिक सहभागिता और शैक्षणिक उपलब्धि को भी सुनिश्चित करता है। शीघ्र पहचान, समय पर उपकरणों का उपयोग, पारिवारिक सहभागिता और व्यक्तिगत चिकित्सा योजना – सफल हस्तक्षेप की प्रमुख शर्तें हैं। यद्यपि संसाधनों की कमी और जागरूकता की चुनौतियाँ मौजूद हैं, फिर भी तकनीकी प्रगति और समावेशी शिक्षा नीतियाँ उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती हैं। अंततः, श्रवण हस्तक्षेप केवल सुनने की क्षमता लौटाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवाद, गरिमा और समान अवसरों को सुनिश्चित करने की प्रक्रिया है।

Thursday, April 12, 2018

सूनने की प्रक्रिया



सूनने की प्रक्रिया 

          हमारे कान के कार्य उस समय प्रारम्भ होते है, जब किसी आवाज को सूनने या सम्प्रेषण करने होते हैं I 
बाह्य कर्ण :-
              सबसे पहले हमारा बाह्य कान वातावरण में उपस्थित विभिन्न प्रकार की आवाजों को इकठ्ठा करता है I
  1. वातावरण में उपस्थित आवाजों  को इकट्ठा करता है जो एक उर्जा होती है उसे ध्वनि उर्जा कहलाती है 
  2. बाह्य कान अर्थात पिन्ना  का कार्य उन आवाजों को लगभग 5000 से 6000 हर्ट्ज तक बढ़ाना है और उसके बाद आगे की तरफ प्रेषित करता हैI 
  3. ये आवाजे कर्ण नलिका में प्रवेशित हो जाती है और कर्ण नलिका उन आवाजो (5000 से 6000 हर्ट्ज) को 2500 से 3000 हर्ट्ज तक  करके कान के परदे तक भेजता है I 
  4. ये आवाजें जाकर जब कान के पर्दे से टकराती है तो उसमे हलचल उत्पन्न हो जाती है I 
मध्य कर्ण :-
  1. कान के पर्दे में आवाजो के टकराने से (5) मध्य कर्ण की तीनों हड्डियों (मैलिअस, इन्कस एवं सतैपिस ) में भी हलचल उत्पन्न होती है अर्थात ध्वनि उर्जा यहाँ पर आकर यांत्रिक उर्जा का रूप धारण कर लेती है I 
  2. यह यांत्रिक उर्जा आतंरिक कान तक प्रसार करने लगाती है I 
अन्तः कर्ण या आतंरिक कान :-
  1. मध्य कर्ण में ध्वनि यांत्रिक उर्जा में बदल जाती है जिसके कारण अन्तः कर्ण में भी हलचल होने लगती है 
  2. अन्तः कर्ण को दो भाग होता है जहाँ पहला काक्लिया और वेस्तिबुल होता है 
  3. जहाँ पर काक्लियर डक्ट , सकेला वेस्टिबुली ,सकेला टिम्पैनी पायी जाती है जिसमे  इंडोलिम्फ और पेरीलिम्फ द्रव पाया जाता है जिसमे यांत्रिक उर्जा रासायनिक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है I
ऑर्गन ऑफ़ कार्टी :-


  आतंरिक कर्ण में ही ऑर्गन ऑफ़ कार्टी पाया जाता है I यह बेसलर झिल्ली पर पाया जाता है ,बेसलर झिल्ली सकेला मिडिया और सकेला टिम्पैनी को अलग करने वाली झिल्ली होती  है इसमें लगभग 17000 रोम कोशिकाएं जाती है बाह्य रोम कोशिकाएं एवं आतंरिक रोम कोशिकाएं I


यहा तक आते आते  ध्वनि का जो बदलता प्रारूप जो रासायनिक था वह बाह्य रोम कोशिकाएं एवं आतंरिक रोम 
कोशिकाओं के आपस में टेक्टोरियल मेम्ब्रेन या झिल्ली से आपस में घर्षण के कारण विधुत उर्जा में परिवर्तित हो जाती है I यह विधुत उर्जा श्रवण मार्ग के द्वारा हमारे मष्तिष्क तक ध्वनि संकेत को पहुचती है 

इस प्रकार से व्यक्ति किसी भी ध्वनि को सून पाने में सहायता मिलाती है I    

Monday, April 9, 2018

कान की संरचना

मानव कान 

         जैसा की  हम  जानते हैं  मनुष्य के कान को आवाज की दुनिया  का द्वार कहा जाता है I यह व्यक्ति का एक ऐसा श्रवण का साधन है जो वातवराण  में उपस्थित ध्वनियो को हमारे मष्तिष्क तक ले जाने मे मदद करता  है  जिससे हमे ज्ञात होता है कि ध्वनि कहा से आ रही है?  ध्वनि किस प्रकार की है? ध्वनि किसकी है ? ध्वनि के श्रवण का स्तर क्या है? इन सभी प्रश्नो के उत्तर हमारे कान के कारण आसानी से मिल जाते हैं I 

मानव कान की संरचना :-
                                         मनुष्य का कान मुख्यतः तीन भागों में बटा  होता है 
  1. वाह्य कान (External Ear)
  2. मध्य कान (Middle Ear)
  3. आतंरिक  कान (Inner Ear) 
  1. वाह्य कान (External Ear):- इसका आकार कोन की आक्रती का होता है , इसके गहरे भाग को कोंचा कहते हैं बाहरी कान Elastic Cartilage का बना होता है इसमे खून का प्रवाह होता रहता है I इसमे एक वाह्य कर्ण नलिका होती है जिसका आकार 'S' की तरह होता है I इसके एक किनारे पर पिन्ना और दुसरे किनारे पर कान का पर्दा  होता है इसकी लम्बाई लगभग 25-40 मिमी० और Volume 4 CC का होता है I इसका बाहरी 2/3 भाग कार्टिलेज का बना होता है , अन्दर का १/3 भाग बोनी होती है कान की नली में भी खून का प्रवाह होता रहता है I 
    Outer Ear
  2. मध्य कान (Middle Ear):- यह कर्ण पटह से भीतरी शिरा की ओर करोटी की टिम्पैनिक बुल्ला (Tympanic Bulla ) में बंद हवा से भरी असममित गुहा के रूप में होती है I जिसे कर्ण गुहा (Tympanic Cavity) कहते हैं I इसके चारो-ओर की हड्डीयों पर श्लेमिका मढ़ी होती है , गुहा की चौड़ी यूस्टेचियन नलिका (Eustachian Tube ) द्वारा नाशाग्रसनी (Nasopharynx) में खुलती है I 
  • सबसे पहले हमारे कान में कान का पर्दा (Tympanic Membrane) होती है , यह बाहरी कान को मध्य कान से अलग करती है यह एक बहुत पतली झिल्ली की तरह होती है जिसकी मोटाई 1 / 10 मिमी ० होती है I इसका आकार अंडाकार होता है I कान के परदे से परस्पर जुड़ी तीन छोटी-छोटी हड्डियाँ होती हैं बाहर की ओर मैलिअस (Malleus)  बीच में इनकस (Incus) तथा इस्टेपिस  (Stapes) होती है I 
  • सभी कर्ण अस्थिकाएं लचीले स्नायुओं  (Ligaments )द्वारा कर्ण गुहा की दिवार से गुहा में धसी रहती है I 
  • इसके अतिरिक्त मैलिअस (Malleus) , Tensor Tympani नामक दृढ पेशी द्वारा जुड़ी होती है I इस पेशी के खिंचाव से टिम्पैनिक कला बनी रहती है 
  • मैलिअस (Malleus ) जबड़ों की आर्टिकुलर हड्डियों से जुड़ी रहती है I 
  • इन्कस (Incus) क्वाट्रैड हड्डियों तथा स्टैपीस (Stapes ) फेनेस्ट्रा ओवैलिस पर मढ़ी झिल्ली से लगी रहती है I
  • Middle Ear
3.आतंरिक  कान (Inner Ear) :-अन्तः कर्ण दो भागों में बटा होता है 
  1. काक्लिया (Cochlea- Organ of hearing) 
  2. वेस्टीबुली (Vestibule- Organ of balance)
  1. काक्लिया (Cochlea- Organ of hearing) :- यह घोघे की आकार का बोनी होती है यह मध्य कान की तरफ़ होता  है यह 2/3 भाग मुडा होता है 
    Cochlea-Organ of hearing
    इसका आकार चौड़ा और मध्य कर्ण की तरफ होता है एपेक्स पतला  या नुकीला होता है I इसमे दो प्रकार की खिड़की होती है एक ओवल विंडो और राउंड विंडो इन दोनों खिडकियों को आधार या वेशलर मेम्ब्रेन अलग करती है काक्लिया का कम्पार्टमेंट जो ओवल विंडो से जुड़ता है वह वेस्टीबुली होता है , इसका वह कम्पार्टमेंट जो राउंड विंडो से जुडा रहता है उसे सकेला टिम्पैनी कहते है , इन दोनों के बिच में स्कैला मिडिया जिसमे इंडोलिम्फ भरा होता है इस भाग में ऑर्गन आफ कार्टी रहता है जिसे श्रवण का अंत कहते हैं I 
  2. वेस्टीबुली (Vestibule- Organ of balance):- इसके द्वारा व्यक्ति का बैलेंस बनता है अनु स्थिति का पता चलता है I 
इस प्रकार व्यक्ति का श्रवण सही तरह से होता है I